Tuesday, March 22, 2016
लकड़ी
सुन लो ऐ दुनिया वालो यह जग बना है लकड़ी का
सब लकड़ी ही है
Friday, January 15, 2016
शिकायत
वो धमकी भी देती
जिस दिन ये तुमसे रूठ गयी तब पता चलेगा
जिस दिन ये तुमसे रूठ गयी तब पता चलेगा
प्यार के हसीं दिन थे
प्यार की दोपहरें..
प्यार भरीं मानसून
प्यार की जनवरी
प्यार की सर्दियाँ
प्यार की दोपहरें..
प्यार भरीं मानसून
प्यार की जनवरी
प्यार की सर्दियाँ
कभी कभी तो लगता हैं
जैसे ये सर्दियाँ बस आशिक़ों के लिए ही बनी हैं..
जैसे ये सर्दियाँ बस आशिक़ों के लिए ही बनी हैं..
वो शॉल में लिपटी काज़ल से सजी आँखों से
मुझे एक टक देखती
मुझे एक टक देखती
ठण्ड में कंप कपाती उँगलियों से अदरक की चाय का प्याला और ज़ोर से पकड़ती
हवा के हर झोंके पर ठीठुरती
सर्द कांपते होंठो से गर्म धुंआ निकालती
पुरानी खिडक़ी में खड़े हो कर
घने कोहरे में देर तक मुझे ढूंढ़ती
मोनालिसा से कम कहाँ थी वो
मैं अचानक उसके शर्मीलें हाथों की छुअन पढ़ने लगा था
मैं अचानक ये भी जानने लगा था
मेरे दरवाजे पर सहमी सहमी दस्तकें किसका पता पूछती हैं
मैं अचानक उसकी बातूनी आँखों की खामोशियाँ पढ़ने लगा था
मैं अचानक ये भी जानने लगा था
मेरे दरवाजे पर सहमी सहमी दस्तकें किसका पता पूछती हैं
मैं अचानक उसकी बातूनी आँखों की खामोशियाँ पढ़ने लगा था
जरुरी भी था आखिर वो कुछ कहती ही कहा थी
दिल का रास्ता लंबा था
तो बस क्या हुआ पड़ाव भी बढ़ते गए
तो बस क्या हुआ पड़ाव भी बढ़ते गए
दो मुसाफिर मिलते थे
कभी किसी कार्ड की दुकान पे
कभी किसी कॉफ़ी शॉप पे
किसी समोसे की दुकान पे
कभी ब्लैक में टिकिट ले कर थिएटर की सीटों पे
कभी किसी कार्ड की दुकान पे
कभी किसी कॉफ़ी शॉप पे
किसी समोसे की दुकान पे
कभी ब्लैक में टिकिट ले कर थिएटर की सीटों पे
फिर एक किसी इंटरवेल में
मैंने कहा एक बेवकूफी भरा आईडिया आया है
उसने मेरे कंधे से सर उठा कर
उसने मेरे कंधे से सर उठा कर
आसुंओं में नम् आँखों से कहा तुम्हारे सारे आईडिया बेवकूफी भरे ही होते हैं
गौरव कश्यप
Tuesday, January 12, 2016
Saturday, January 2, 2016
तन्हा
तन्हा लोगो के शहर में तन्हा रहता हूँ मैं....
कभी खुद से छुपना चाहता हूँ
कभी सिर्फ खुद से मिलना चाहता हूँ
देर से सोता हूँ
देर से उठता हूँ
कोई खाना बना जाता है
कोई कपड़े धो देता है
मैं बस चलता रहता हूँ
ज़िन्दगी की कन्वेयर बेल्ट पे
एअरपोर्ट पे खो गए किसी सूटकेस की तरह अकेला
कभी कभी बड़ी खूबसूरत लगती है ये तन्हाई
कभी कभी जैसे कातिल की निगाहों से मुझसे बात करती है
शिकायत बहुत करता हूँ मैं
आज बैठा हूँ खिडक़ी के पास अदरक की चाय का प्याला लेकर
जाने कितने सालों से इतने इत्मिनान से अपने साथ ही नहीं बैठा
जाने कितने दिनों बाद अपने दोस्त इस शहर की आवाजें सुन रहा हूँ
सड़क पे बेतरति.. बेमक़सद चलती गाड़ियाँ
बीवियों का आर्डर की जल्दी आना बच्चों की हँसी
लगता हैं कितनी सदियाँ बीत गयी
मुझ जैसे लेट लतीफ़ आलसियों ने सुबह का हिंदुस्तान तो जैसे देखा ही नहीं
घर से दूर सा हो गया हूँ अक्सर फोन पे बात करता हूँ
माँ ने SMS करना भी सिख लिया हैं
कभी कभी अचानक फ़ोन देख मुस्करा पड़ता हूँ
माँ का मैसेज आता है "Beta How are You?"..
अपना मुल्क सचमुच बदल रहा है मेरे दोस्त
माँ का SMS अंग्रेजी में
कभी कभी अचानक फ़ोन देख मुस्करा पड़ता हूँ
माँ का मैसेज आता है "Beta How are You?"..
अपना मुल्क सचमुच बदल रहा है मेरे दोस्त
माँ का SMS अंग्रेजी में
एक टाइम था जब न फ़ोन था.. ना SMS
डॉ की क्लीनिक की तरह 2 मिनट बात करने के लिए PCO में इन्तजार करना पड़ता था
एक समय वो भी था जब अंतर्देशीय पत्र (Inland latter) पे चिट्ठी लिखा करते थे
अक्सर सोचता हूँ क्या मैं इतना बदल गया
कि ये दुनिया ही बदल गयी
कि ये दुनिया ही बदल गयी
मैं अगर अपने माज़ी (Past) से मिलता
और उससे कुछ कहता कि मेरी बीती हुई ज़िन्दगी में कुछ बदल दे तो क्या होता ?
--गौरव कश्यप
Thursday, December 31, 2015
DREAMS
A spirit flying through the air,
And could see my my home ans my family
But then i woke up
.
.
I was on the ground
when I step out of the Dream
things are never looked what they seems
what I thought was real wasn't real at all
.
.
Nothing is as bright or clear
But my dream is always there
and it give me a hope that one day it will return
If i am lucky enough i can see my friend my desire again.
--GRVDON
--GRVDON
Thursday, August 6, 2015
एक तुम … एक मैं
तुम चांदनी...तेरी रात हुँ मैं..
तेरी चाहत मे भटकता हुआ सा एक बादल मैं...
तुम्हारे दिल मे छिपे ज़ज्बातो का अल्फा़ज हुँ मैं ...
तु जिस्म रुह हुँ मैं....
तु जख्म .... मरहम हुँ मैं...
तु खुदा है मेरी ...तेरी इबादत हुँ मैं...
तु गुमसुम सी जब बैठी... तेरी तन्हाई हुँ मैं...
मुझे क्यों खोजती है पगली तेरे भीतर ही हुँ मैं...
तेरी चाहत मे भटकता हुआ सा एक बादल मैं...
तुम्हारे दिल मे छिपे ज़ज्बातो का अल्फा़ज हुँ मैं ...
तु जिस्म रुह हुँ मैं....
तु जख्म .... मरहम हुँ मैं...
तु खुदा है मेरी ...तेरी इबादत हुँ मैं...
तु गुमसुम सी जब बैठी... तेरी तन्हाई हुँ मैं...
मुझे क्यों खोजती है पगली तेरे भीतर ही हुँ मैं...
--गौरव कश्यप
Friday, July 31, 2015
नजरें
आवामी भीड़ से दुर अपने वजुद को तलाशती...
सैकड़ो किट-पतंगो से पल -पल रुबरु होती...
आने वाले कल को निहारती सहमी हुई सी....
पुरानी यादो के बक्सो मे लम्हे टटोलती फिर सोचती...
कुछ अधुरे अरमान बय़ान आंखो से करना चाहती...
अंबर से बरसते झरने मे खुद को खोने से बचाती...
उसके मिलने की आश मे दुर क्षितीज को ताकती...
मेरी ये नजरें हर भीड़ मे तुझे ही तलाशती...
-- गौरव कश्यप
Saturday, February 28, 2015
PK- The Real India
![]() |
| भीतर जाते जाइये जकड़न मजबूत पाइए |
PK फिल्म देख कर देश के हर तबके हर वर्ग के लोगो ने भिन्न- भिन्न प्रतिक्रिया दी॥
कुछ ने अच्छा कहा, कुछ ने व्यंग का दर्जा दिया, कुछ ने तो हमशक्ल और हैप्पी न्यु ईयर का भाई तक कह डाला॥
कुछ ने अच्छा कहा, कुछ ने व्यंग का दर्जा दिया, कुछ ने तो हमशक्ल और हैप्पी न्यु ईयर का भाई तक कह डाला॥
खैर मुद्दा तो फिल्म की कहानी का है... कहानी मे 101% सच्चाई है... और इसको नकारने वाला प्राणी राँग नम्बर से पीड़ित घोषित किया जाएगा॥
भांति-भांति के बाबा, पीर, फकीरो ने हमारे समाज के लोगो मे नर्क... जहन्नुम कह कर कुछ डर पैदा कर दिया है.. और भगवानों के नाम पे चंदा जमा करना, पुजा मे चढ़ावा, मंदिरो मे बैक डोर एंट्री द्वारा जल्दी दर्शन, वी आई पी पास...... मजारो पे जबरन की चादरो का बोझ ना जाने ये चादरें और नारियल कितनी मर्तबा भगवान और बाबा को नमस्कार कर चुकी है॥
समाज का एक आलसी निठल्ला वर्ग पीढ़ी दर पीढ़ी इस गोरख धंधे पे बैठा है और पैसे बटोर रहा है...
उदाहरण के तौर पर बनारस का गंगा घाट पंडा समुदाय आपकी फिरकी लेता नज़र आएगा
फिल्म मे एक जगह थप्पे की भी बात कि गई..... जो कि दुसरा ज्वलंत मुद्दा है.... बचपन का एक वाक्या साझा करना चाहुँगा... जब मै स्कुल मे था लंच ब्रेक मे क्लास के सभी लोग साथ बैठ कर दुसरे का ही टिफिन खाते कोई जाति नहीं .... कोई मजहब नहीं .... सब दोस्त हुआ करते थे ... स्कुल... कॉलेज खत्म ... वैसे ही अखंड एवं परम ज्ञान की प्राप्ति हुई... मजहब और जातिवाद... अगर आप मजहबी विचारधारा से डिट्टो मिलते है तो सही वरना आप इस समाज पे बोझ करार दिए जाएंगे.... आप की कोशिशो को धर्मविरोधी, नास्तिक, लव जेहाद इत्यादि नामो से पुकारा जाएगा॥
सब एक दुसरे पे लांछन लगा रहे है ... कोई कहता हिंदु बेईमान तो कोई गद्दार मुसलमान कहता..... अबे पहले ये तो देखो मंदिर मे हिंदु और मस्जिद/ मजारो पे मुसलमान ही अपने लोगो का चुतिया काटने मे लगे है....
किसी भी बात को धर्म के तराजु पे तौलने के पहले खुद की तर्क पे पहले रखो....खोपड़ी मे एक पिद्दी सा भेजा भी है 3% तो कम से कम पुरा उपयोग करो
जो झुठ बोल सकता है उसे यहाँ रहने का वीसा है... वरना गुरु 9-2-11 हो लो.... नो वेकेंसी टोटल सन्नाटा .... क्या समझे...
Sunday, February 22, 2015
दिल-ए-नादान
दिल क्या करे
हज़ारो की भीड़ में भी
तन्हा रहे
तन्हा खवाबो में चले
बस उसे ही ढूँढता फिरे
टकटकी सी लगाये हुए
रिमझिम बारिश की बूंदों को ताकना
वृक्षों की शाखों और पत्तो पे बूंदों का नाचना
नदियों के सरहाने बैठ
किनारों को मिलाने की चाह
ये जो मेरे थे सहारे
भंवर में खो से गये
ये धड़कने थम सी गयी,
लम्हें भी हम से हैंरान,
गुजरी वो रातें रूह के बिन,
साँसें भी बेचैन सी है,
धुँधलाते कुछ हसीं लम्हें
तेरी बातों, तेरी यादों में जो गुजारें
हम नादान फिर भी
कसूरवार दिल को समझते रहें
--गौरव कश्यप
Monday, January 5, 2015
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