Wednesday, March 26, 2014

"शायद .........अक्सर"


अक्सर मैं तुमको ख़ामोशी में सुनता हूँ ,
तुम कहो दिन भर कि छोटी-छोटी कहानियाँ।।

अक्सर तुम शरमा जाती हो... आज भी ,
तुम को जो खूबसूरत मैंने कह दिया।।

तुम ही सुबह हो मखमली सी धुप हो,
तुम हो तो मिट जाएँ गम कि परछाइयाँ।।

तुम संग उड़ता हुँ लेकर ख्वाबों का कारवां,
चल पड़ेंगे अंधेरो में संग ले ख्वाबों कि कश्तियाँ।।

कल ख्वाब जो देखा तन्हा-तन्हा तो रुआंसा हो गया,
शायद डरने लगा कि मैंने तुमको कहीँ खो ना दिया।।

शायद हम तुम कुछ मशरूफ़ थे खुद मे कुछ वक़्त से,
शायद है कुछ जो लब् कह न सके कि तुम बिन हम अधुरे।।

शायद तुम कहती नहीं जो है एक अनकहा 
शायद तुम सोचती हो मैंने वो सुन लिया।।
गौरव कश्यप

Saturday, February 8, 2014

प्यारा लम्हा


इन वादियों में बिछी रंगो कि बहार देखकर
जिंदगी एक दिन फिर कानो में आहिस्ते से कहे देती है 
तुझे एक बार फिर आना होगा

इन्ही गलियों और चौराहों पर हँसते हुए कहता हूँ मैं 
पगली वादा रहा तेरे संग हर एक पल गुजारूँगा मैं 
तुझसे मुलाकात इस बार कर ही लूंगा मैं 

 झूमती हुई ये डालियाँ...... नीली-नीली पत्तियां  
कह जाएँ ये कि बस तुम हो यहाँ और मैं 
और बस एक लम्हा प्यार का 
ऐसी गहराइयाँ  …… गूंजती खामोशियाँ 
फिर तुम और मैं और बस ये एक लम्हा प्यार का 
                                                                                    --गौरव कश्यप
                                                                                                                                                  

Thursday, February 6, 2014

मुस्कुराहट


ज़िन्दगी एक बार फिर मुस्कुराने लगी मेरी,
गीत प्यार भरे गुनगुनाने लगी मेरी,
वाकिफ़ हो चला हूँ " अंजाम-ए-मोहब्बत " से तेरी,
ज़िन्दगी धोखा खाने लगी मेरी,
डर के तूफ़ान में थपेड़ो से कश्ती,
साहिल से टकराने लगी मेरी,
बयां करने को लाखो थे गिले शिक़वे,
पर सामने पा कर तुझे ज़ुबाँ लड़खड़ाने लगी मेरी,
बहुत अरसे से मायूस था दिल,
एक झलक पा कर तेरी लो तमन्ना फिर मुस्कुराने लगी मेरी, 

Wednesday, January 8, 2014

एक एहसास

 एह्सास था मुझे , एह्साह था तुझे,
फिर क्यों सपनो के दीए अधूरे बुझे।

बीते दिनों की बातें सोने न दें रात भर,
तन्हाई के साये तले हम खो गए किधर।

बदल गया है शमां  न रहे अब वो गम,
खो गया वो ख्याल टुट गए सब भ्रम।

जो चाहा कर न सका
सुनता रहा दिल मेरा।

क्या कहें कैसे रहें दूर तुमसे हो गए,
कुछ हालत से तो कुछ खुद से मजबूर हो गए..
        
                                                                                          गौरव  कश्यप

Tuesday, December 17, 2013

राहें.....


 राहें तो कई है , 
पर मेरी वो नहीं हैं,
जो तुझसे आ मिलाये वो रस्ता ना मिल सका,
मंजिल मेरा मुझे न मिल सका…… 
मेरा साया भी अब जुदा सा है,
पर मुझसे कुछ कह रहा है,
पूछे है मुझी से,
क्यों मुझसे मेरा यार ना मिल सका



Monday, September 2, 2013

प्रगति


मसला न प्यार का हैं , न पॉवर का , न किसान का ,
न ज़मीन का, न गाँव कस्बे या शहर का … मसला है देश का 
देश लोगो से बनता है, लोग, मतलब समूह … भीड़ 
और भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता,
भीड़ को चेहरा देता है उसका नेता ……. 
तो जो चेहरा मेरा है ,  वही मेरे नेता का और मेरे देश का होगा 

जब मैं आध्यात्मिक था तो देशभक्त और देशपुत्र था 
जब विलासी हुआ तो राजा मिहिर बना 
कमज़ोर पड़ा तो सिकंदर और टुटा तो बाबर कहलाया गया 

जब मैंने व्यापार किया तो देश गुलाम हुआ , 
और बागी बना तो देश आज़ाद हुआ 
जब आज़ाद हुआ तो मैं स्वार्थी हुआ … 
स्वार्थी तो भ्रष्ट
भ्रष्ट तो धनवान 
धनवान तो सफल
सफल तो प्रगतिवान 

प्रगति ……. देश की प्रगति 
देश की प्रगति हेतु मेरी व्यक्तिगत प्रगति अनिवार्य है 
                                                                                     
                                                                                             गौरव कश्यप
                                                                                                     

Monday, April 1, 2013

सपनो का लोकपाल

 Dreamer of Dreams
 जब भी मैं इन बदसूरत खेतो की ...
बदमस्त फसलो को हवा में झूमते देखता हूँ ...
तो मेरा एक सपना मेरी पलके नोचने लगता है ...
मेरा सपना ...
बड़ी बड़ी दैत्यकाय मशीने , बुलडोज़र ..स्टोन क्रशर , इंडस्ट्रियल क्रेने ...
हवा में उड़ता हुआ सुखा सीमेंट ....हज़ारो की तादाद में मौजूद मजदुर ...
बादल उड़ाते कारखाने , भभकती भट्टिया , धधकती चिमनियाँ ...
दायें ... बाएं ऒर वर्कर्स के घरौंदे ...
और सामने धुप उछालती रौशनी में नहाई ...
ऊँची-ऊँची गगनचुंबी शौपिंग मॉल की इमारतें ...
मुल्तिप्लेक्सो में फिल्मो के रंगीन पोस्टर्स ...
फैक्टरी ... कंपनियो में एक हाथ से पगार देकर ...
शौपिंग मॉलो में दुसरे हाथ से वापस बटोर रहे हम ...
शाम के धुलके में , फैक्टरी की मीनारी चिमनियों से उठता धुंआ ...
धुंआ ... आसमान में हमारी नश्लो की दास्ताँ लिख रहा होगा ...

-गौरव कश्यप  

 

Friday, March 8, 2013

मेरी


ज़िन्दगी मुस्कुराने लगी है मेरी,
गीत प्यार के गाने लगी मेरी......
मैं जानता हूँ "अंजाम-ए-मोहब्बत" पे
ज़िन्दगी धोखा खाने लगी मेरी ....
भयभीत हो तूफानी थपेडो से कश्ती,
साहिल से टकराने लगी मेरी,
करने बहुत से थे गिले शिकवे,
पर जुबां लड़खड़ाने लगी मेरी ..
बहुत अरसे से मायूस था दिल,
लो तमन्ना फिर मुस्कुराने लगी।।

Thursday, March 7, 2013

@ मजबूर खुदा @



रोज़ उठते धुएं की कालिख से ,
उस तरफ आसमां का एक टुकड़ा सारा दिन अफ्सिया सा रहता है....
उसके नीचे न कोई सजदा करे ,
सर झुका के अब ज़मीं पे रखने से अब खुदा पाँव खींच लेता है......
कूड़े करकट की ढेरियो पे ,
अभी भी ठन्डे लाशो के सर सुलगते से पाए मैंने है ....

टांगो.. बाहों..की हड्डियों के लिए,
जीने की आस में लड़ते रहते भूखे चौपाये है.... 

और जिसने पहले दांत मारे है,
   हड्डी बोटी - बोटी पे हक उसी का है .....

कमबख्त मज़हब के गुलाम पूछते है, अब की कुदाल पहले किसने मारी थी ...
कोई कहता है एक मस्जिद थी .. कोई कहता है एक मंदिर था ..
खुदा भी अब सर झुका के अब ज़मीं पे रखने से अब खुदा पाँव खींच लेता है ......
इसको भी अब यकीं नहीं आता की .. कभी इस ज़मीन पर उसका भी एक घर था।

Tuesday, May 1, 2012

कुछ बोलना चाहता हूँ

 सोच  गहरी हो जाए तो  फैसले मुश्किल हो जाते है 



    










                             आज सीले होठो से कुछ बोलना चाहता हूँ ,
                                               बंद हाथो को अब खोलना चाहता हूँ ,
             दूर किसी मुकाम में जाना था मुझे,
                                           आज खुद को इन हवाओं में घोलना चाहता हूँ  l
            माँगा था तुझको जब किये थे सजदे,
                                             वो आर्जुओ के सजदे ,वो आंसुओ के सजदे,
           आज उन सजदो को तुझसे तोलना चाहता हूँ ,
                                             बंद होठो से आज कुछ बोलना चाहता हूँ  l  

                                                                                                             गौरव कश्यप